श्री गणेश बाग मंदिर ग्वालियर250 वर्ष से अधिक प्राचीन व प्रसिद्ध गणेश मंदिर ग्वालियर शहर के प्राचीनतम गणेश मंदिरों में से है, जिसका निर्माण सिंधिया काल में 1840 ई के लगभग हुआ। प्राचीनकाल से ही श्री गणेश जी की महत्वता रही है। वे प्रथम पूज्य हैं। गणपति शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में मिलता है। शुक्ल यजुर्वेद एवं मैत्रेयी संहिता में भी श्री गणेश जी का विवरण मिलता है।
1843 ई तक जनकोजी राव ग्वालियर के शासक थे। इस मंदिर का पुनरुद्धार महाराज जीवाजी राव सिंधिया के शासनकाल में हुआ, जबकि उनके आदेश पर टाउन इंप्रूवमेंट ट्रस्ट द्वारा संवत 1996 (विक्रम संवत सन 1938) ईस्वी में कराया गया।
जब मराठा शक्ति का प्रसार उत्तर भारत में हुआ, तब पेशवा बाजीराव प्रथम ने इस क्षेत्र की जिम्मेदारी राणोजी सिंधिया को प्रदान की। 1761 में पानीपत के तृतीय युद्ध के पश्चात महादजी सिंधिया ने इस क्षेत्र में अपनी सत्ता स्थापित की। उनके पश्चात दौलत राव सिंधिया ने 1810 ईस्वी में उज्जैन के स्थान पर ग्वालियर को अपनी राजधानी बनाया एवं लश्कर शहर की स्थापना की। तथा अपने सामंतों को जागीरें प्रदान की। सरदार आपटे को इस क्षेत्र की जागीर दी, जहां उन्होंने गणेश बाग बनाया। इस गणेशबाग में ही यह प्राचीन एवं ऐतिहासिक गणेश मंदिर स्थापित है। ऐसा कहा जाता है कि 1857 की क्रांति के पूर्व भी इस मंदिर में नियमित रूप से पूजा अर्चना होती थी। यह गणेश मंदिर महाराज बाड़ा ग्वालियर शहर के हृदय स्थल से आगरा एवं दिल्ली को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण मार्ग एबी रोड पर कटी घाटी नामक स्थान पर स्थित है। महाराज बड़ा से मात्र 3 किलोमीटर पर यह मंदिर है। यह मंदिर एक सुरम्य वातावरण में प्रसिद्ध पर्यटन स्थल तथा ग्वालियर शहर के प्राचीन एवं सर्वाधिक विशाल जनकताल के समीप स्थित है। जनक ताल में सिंधिया शासक स्नान एवं शिकार हेतु रुकते थे। यहीं पर ग्वालियर शहर में सर्वाधिक ऊंचाई पर, पहाड़ी पर विराजमान भेलसे वाली माता का मंदिर है। इसके समीप ही प्रसिद्ध एवं विशाल गरगज के हनुमान जी की 11 फीट ऊंची प्रतिमा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह प्रतिमा मानव निर्मित नहीं है। गर्जना के साथ प्रकट हुई, इसी कारण इन्हें गरगज के हनुमान कहा। इस गणेश मंदिर के समय भी गरगज पहाड़ी है, जो ग्वालियर का सर्वाधिक ऊंचा स्थान है। अंग्रेजों ने इसी स्थान से ग्वालियर दुर्ग पर तोप चलाकर आक्रमण किया था।
गुप्तकाल में भारत में अनेक मूर्तियां एवं मंदिरों का निर्माण हुआ। सिंधियावंश के शासको की भी रुचि मूर्ति एवं मंदिर निर्माण में रही। इस काल में जनकोजी राव से लेकर जीवाजीराव तक शासकों ने अनेक मंदिरों का निर्माण कार्य कराया, जिनमें कोटेश्वर महादेव मंदिर, मांडरे की माता आदि अनेक प्रसिद्ध मंदिर हैं।
गणेशबाग स्थित यह प्रतिमा मनमोहक है, जिसके दर्शनमात्र से ही भक्तिभाव जागृत हो जाता है। चारभुजाधारी, पीला पीतांबर धारण किए, ऋद्धि एवं सिद्धि के साथ श्री महागणेश विराजे हैं। हाथों में सुंदर पुष्प, सुंदर मुकुट एवं मूषक पर विराजे प्रभु की छवि अत्यंत मनमोहक है। उनकी प्रतिमा पर पवित्र सिंदूर का लेपन है। यह प्रतिमा एक वर्गाकार गर्भगृह में विराजमान है। गर्भगृह के सामने प्रतिहारकालीन परंपरा में अलंकृत स्तंभ है। गर्भगृह की उतरी दीवार पर गणेश जी की स्तुति अंकित है। गर्भगृह के पश्चात महामंडप है, जो अलंकृत स्तंभों पर आधारित है। चौकोर गर्भगृह के ऊपर नागर शैली में शिखर है। मंदिर की साथ सजासज्जा के लिए मंदिर अलंकरण के विभिन्न प्रतीकों जैसे ललाटबिम्ब, कलश, स्वास्तिक, पत्रलता, आदि मांगलिक प्रतीकों का अंकन है। इसी गणेश मंदिर के प्रांगण में एक नवग्रह मंदिर भी स्थापित है, जिसका निर्माण महाराज जीवाजीराव सिंधिया ने कराया था। जनश्रुति के अनुसार महाराज पर शनि की साडेसाती का प्रकोप था। अतः ज्योतिषों की सलाह पर उन्होंने यहां नवग्रह मंदिर का निर्माण कराया। यहां नवग्रह- सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु की प्रतिमाएं हैं। मुख्य द्वार पर एक अभिलेख प्राप्त हुआ ।
जनश्रुति के अनुसार इसी समय श्री गणेश मंदिर को नवीन स्वरूप प्रदान किया गया।
सरदार आप्टे जी के वंशज स्वर्गीय श्री नारायण राव पुत्र श्री माधवराव श्रीधर आप्टे द्वारा 18 जनवरी 1975 को दानपत्र संपादित कर गणेशबाग की 5 बीघा 14 विस्वा भूमि मध्यभारत शिक्षा समिति को दान में दी गई। अपनी संपत्ति का समाज एवं राष्ट्र हित में प्रयोग हो , इस हेतु उन्हें मध्यभारत शिक्षा समिति सबसे उचित उत्तराधिकारी बोध हुई, समिति के समाजहित और शिक्षा प्रसार के योगदान एवं कार्य को देखते हुए उन्होंने यह निर्णय लिया। समिति ने इस भूमि का नामांकन 30 सितंबर 1995 में करवाया।
समिति के अध्यक्ष श्री राजेन्द्र बंदिल जी द्वारा मंदिर निर्माण के कार्य को गति देते हुए मंदिर के प्रबंधन हेतु समिति द्वारा गणेशबाग मंदिर न्यास का गठन किया जिसके अध्यक्ष श्री मानसिंह जादौन जी अधिवक्ता तथा अन्य न्यासी श्री पप्पू वर्मा जी विश्व हिन्दू परिषद, श्री जागेश्वर सिंह भदौरिया जी अधिवक्ता, श्री जगदीश अरोरा जी पूर्व उपायुक्त नगर निगम ग्वालियर तथा श्री शैलेश जैन जी बिल्डर हैं।
मंदिर का जीर्णोद्धारसमिति द्वारा समाज के सहयोग से इस मंदिर का पुनर्निर्माण कर एक भव्य मंदिर प्रांगण बनाने का निर्णय लिया। 7 अप्रैल 2025 को श्री अरुण जैन, अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा इस हेतु भूमि पूजन किया। 22 सितंबर नवरात्रि की शुभ बेला में मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हो रहा है। वर्तमान में यहां श्री गणेश लोक एवं विशाल गणेश मंदिर का निर्माण कार्य प्रगति पर है।
मंदिर निर्माण एवं अन्य व्ययों हेतु लगभग 10 करोड़ की राशि आवश्यक है, जिसे समाज से जुटाने का लक्ष्य है। समाज के कई प्रबुद्धजनों द्वारा इस हेतु अपनी सहर्ष सहमति दी है।
• सामाजिक चेतना व समरसता केंद्र के अंतर्गत सामाजिक समस्याओं पर शोध व समाधान खोजना, लागू करना
• शिक्षा एवं सेवा कार्यों के लिए समर्पित
• वेद विद्यालय, संस्कृत शिक्षण प्रशिक्षण, अंतरिक्ष ज्ञान एवं शीघ्र संस्कार शाला का निर्माण