भारत की सांस्कृतिक चेतना का यदि कोई मूलाधार है, तो वह है धर्म। भारतीय परंपरा में धर्म मात्र religion या पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि वह शाश्वत व्यवस्था है जो व्यक्ति, समाज और सम्पूर्ण जगत को धारण करती है।
भारत को यदि कोई “अक्षुण्ण और जीवित सभ्यता” बनाकर आज तक खड़ा रखे हुए है, तो उसका आधार केवल आर्थिक समृद्धि या राजनैतिक शक्ति नहीं है। वह आधार है — धर्म। धर्म वह है जो हमें “मानव” बनाता है।
भारतीय संस्कृति के इतिहास में मंदिर केवल धार्मिक आस्था का स्थल नहीं रहे, बल्कि वे समाज, संस्कृति, कला, शिक्षा और राष्ट्रनिर्माण के जीवन-केंद्र रहे हैं।