भारतीय संस्कृति के इतिहास में मंदिर केवल धार्मिक आस्था का स्थल नहीं रहे, बल्कि वे समाज, संस्कृति, कला, शिक्षा और राष्ट्रनिर्माण के जीवन-केंद्र रहे हैं। मंदिरों ने हजारों वर्षों तक भारत की सांस्कृतिक निरंतरता और आध्यात्मिक चेतना को जीवित रखा। प्रख्यात इतिहासकार आर.सी. मजूमदार लिखते हैं:
“मंदिर भारतीय संस्कृति का सबसे जीवंत स्मारक है, जिसने विदेशी आक्रमणों, राजनीतिक उथल-पुथल और सामाजिक संकटों के बावजूद समाज की आत्मा को जीवित रखा।”
‘मंदिर’ शब्द संस्कृत के मन्द (आनंद) और इर (प्रदाता) से बना है — अर्थात् जहाँ से आनंद की प्राप्ति हो, वही मंदिर है।
“देहो देवालयः प्रोक्तः जीवो देवः सनातनः।” (गरुड़ पुराण)
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि मंदिर केवल बाहरी ईंट-पत्थर की रचना नहीं है, बल्कि आत्मा और परमात्मा का संगम स्थल है।
विद्वान डॉ. के. एम. मुनशी कहते हैं:
“भारतीय मंदिर राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा के प्रतीक हैं।”
महात्मा गांधी:
“भारतीय मंदिर जनता के नैतिक और सांस्कृतिक उत्थान के केंद्र हैं।”
अतः मंदिर केवल देवालय नहीं, बल्कि भारतीय समाज के जीवनालय और चेतनालय हैं।